इतना विश्वास है मुझ पर,
जो हाथ में डोर देकर तुम उड़ चली हो।
हवा ने शिकायत की है,
कि उसकी शांत बहाव में तुम खलबली हो,
अरे ओ पतंग,
तुम कहाँ उड़ चली हो?
तुम बस पतले पन्ने और सींक से बनी हो,
रुई सी हल्की हो,
फिर भी इतनी दूर चली हो।
तुम्हे डर नही लगता क्या ऊँचाई से?
जो किसी के भरोसे मुड़ चली हो।
पतंग कहाँ को उड़ चली हो?
मुझे भी आश्चर्य होता है,
कैसे तेरा शरीर हवा में आपा खोता है।
कैसे तू खुल कर उड़ लेती है,
कैसे सारी हवा को चीरती भी है,
और बाहों में भी भर लेती है।
कैसे तू इतनी ऊपर से मुझको देख कर हँस देती है,
बस इतना बता, उस हँसी में,
मेरे बड़प्पन की इज़्ज़त है,
या पगलप्पन का मज़ाक।
पर अब जो तू चल दी है,
आसमान की ओर,
कभी साँझ कभी भोर।
चुपचाप सी,
बिना किसी शोर।
तुझे चिंता भी नही है,
जो मांझा तेरा मेरे भरोसे है वो कोई मेरी चूक से काट न दे,
वो जो तेरा मुझ पर अटूट भरोसा है, वो कोई बाँट न ले।
ओए,
तू किसी और के आँगन जो टूट कर गिरेगी,
मुझे भूल जाएगी क्या?
मांझा जो किसी और के हाथ होगा तो,
इतनी ही हिम्मत से उड़ेगी क्या?
जो भी कह लो,
निर्जीव सी हो तुम,
जीवित हाथों में आकर जीवन से भी ज़्यादा जीती हो।
पतंग तुम तो एक त्योहार में,
सारे मोहल्ले को सीती हो।
अरे पतंग रुको,
थोड़ा बतियाने दो,
दो तीन कश तुम्हारी उड़ान के और लगाने दो।
अब पता नही इस छज्जे पर तुम आओगी भी या नही?
जो मैंने तुम्हें साध लिया,
तो अगली बार उड़ पाओगी भी कि नही?
पता नही अब तुम मेरे आँसुओं से गीली हो गई हो।
उड़ पाओगी भी या नही?
माफ़ी!
अब धूप में तुम सूख गई हो,
तुम जाओगी भी या नही?
ओ पतंग तुम कहाँ उड़ चली हो,
वापस आओगी भी या नही?

No comments:
Post a Comment