Jai Hind!

मुझे यह लिखने के लिए क्षमा किया जाए पर स्वतंत्र भारत के बाध्य और बोझिल हृदय में बैठकर मुझे अपना मौन खटक रहा है।  क्यों खटक रहा है? इतने बुद्...
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क्रंदन की तनया ।

लेखन एक तरह का तिलिस्म है । यह मुझे अब समझ आने लगा है, और आता रहेगा । मैं यह जानती हूँ कि आप सभी लेखन को अलंकृत करना एक महत्वपूर्ण अंग समझते...
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पिघलता हुआ पहाड़ ।

प्रिय हिमाचल, काफ़ी दिन हो चले हैं और मैं तुमसे दूर कहीं तुम्हें याद कर रही हूँ। आशा करती हूँ तुम अपने जैसे होगे। स्मृतियाँ भी कित...
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हाँ! मैं मौन हूँ।

मैं मौन हूँ! तुम सोच रहे होगे कि मैं मौन हूँ तो बोल कैसे रहा हूँ। मैं बता दूँ, कि मैं ही बोलता आया हूँ, हमेशा से। हाँ मुझमे धैर्य बहुत...
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शायद कल दशहरा था ।

दशहरा कल ख़त्म हुआ है, और मैं कहीं घूम नही पाई हूँ। इतने रावण चटके इधर उधर, पर पटाकों पर झूम  नही पाई हूँ। पंडालों में न जाने कि...
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ज़िद तक ।

तब से, अब तक और तब तक जब तक सब बदल न जाए । जो साँसें चल रही है, उसकी गति मेरी न हो जाए। बस तब तक इनको चलना है, ताकि आख़िर तक इनको त...
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दीवार

तुम्हारे घर की दीवार क्या मेरे घर की दीवारों जैसी हैं? चुप चाप मुझे इधर से उधर चलते देखती हैं, बिलकुल धीर गंभीर सी वह...
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बचपना

काफ़ी दिनों बाद खुद में उतरी हूँ , टूटी , बिखरी और बिखरे अंग से रंग निचुड़ता हुआ। मैं अक्खड़पने में फिरसे जा पहुँचीं...
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