Nazariya

जब सब कुछ कहना चाहते हैं, सब कुछ करना चाहते हैं, तो क्यों सब नजरिये के बारे में सोचते हैं| तुम्हारे भाव और तुम कुछ ऐसे सम्बन्ध में हो जो जटिल है पर अब संबध तो सम्बन्ध होता है, टूटने के बाद भी पारौक्षिक रूप से जुड़ा होता है, उसका नाम होता है| जैसे खाने के सामान के बाहर का विज्ञापन ही तो ऐसा होता है जो आपको वह सामान लेने पर मजबूर करे वैसे ही हम हैं, हमारे अंतःकरण के भाव दिखने वालों से भिन्न हैं| बाहर वालों को समझाया गया है, सजाया गया है, बदला गया है| 

अब समझ आया क्यों चहरे पर कपड़ों का इस्तेमाल नहीं होता है, क्योंकि चहरे पर भाव पहनने होते हैं| और जैसे आपके भाव वैसे आपका मान सम्मान | अब ऐसा समय है जब सब कुछ सजाया जाता है, कुछ सुन्दर नहीं है, कुछ सच्चा नहीं है| सब फिर से परंपरा हो गया है| सब झूठ है, सब पुतले हैं जो बस बोलने पर चल रहे है| जैसे गुप्तांग को हमेशा छुपा कर रखते हैं, वैसे लोग हैं जो दिमाग को हमेशा छुपा कर रखते हैं| जो सही है, उसे भी तोलते हैं, जो गलत है उस पर तो विचारों का भार डालते ही हैं| 

चलो अब यह बताओ कि चहरे पर कपड़ा है तो उसका सौन्दर्य क्या आप कपड़ों से मापोगे? नहीं न? उत्सुकता होती है सौन्दर्य को जानने की, पर सजे हुए भावों को हटा कर कोई असली भावों तक पहुचना नहीं चाहता है| सब खुद में संसार होकर भी इस छोटे से संसार में नहीं विचर पा रहे| सब उलझ गए हैं प्रश्न बनाने में और फिर उसी प्रश्न का उत्तर देने में| अब देखो कब सुलझने की प्रथा चलती है| कब सच्चाई फिर से परंपरा बनती है|

3 comments:

  1. क्या लिखती है आप आपके प्रति और सम्मान बढ़ गया ।।

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