चुप चाप मुझे इधर से उधर चलते देखती हैं,
बिलकुल धीर गंभीर सी वह, मेरी हर हरक़त को नाप कर रखती हैं।
मैं बेझिझक उन दीवारों के बीच मंडराती हूँ।
क्या तुम्हारे घर की दीवार भी ऐसी ही माँ जैसी होंगी?
कहीं मैं उनसे चलते फ़िरते भिड़ तो नही जाऊँगी?
कहीं भिड़ने पर उच्छंकृल तो नही कहलाऊंगी?
मैं तुम्हारे घर की दीवारों की बेटी तो बन जाऊँगी ना?
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